पुण्डरीक सूत्र और चार आर्य सत्य

डॉ. डोमिनिक स्कारंगेलो
रिश्शो कोसेइ काइ के इंटरनेशनल एडवाइजर

मार्ग के सत्य का अभ्यास करना 

पिछले महीने हमने दु:ख के कारण के सच, यानी दूसरे ‘आर्य सत्य’ पर बात की थी। इस बार हम दु:ख को खत्म करने के रास्ते के सच के बारे में जानेंगे, जिसे आम तौर पर चौथा और आखिरी ‘आर्य सत्य’ माना जाता है। हम इसके बाद रास्ते के सच पर बात करेंगे क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी के दृष्टिकोण से, जब हम अपनी चिंता और परेशानी के कारणों को समझने लगते हैं, तो हमारा अगला काम उन तरीकों और कामों को पहचानना होता है जिनसे हम उस दु:ख से छुटकारा पा सकें।

सितंबर में, मैंने दु:ख का एक आसान उदाहरण साझा किया था— ट्रैफिक जाम में फँसने पर चीजों का मेरी इच्छा के अनुसार न होने से हुई परेशानी। ‘कारण के सत्य’ के अभ्यास के माध्यम से, मैंने उस दुःख के कारण-कार्य संबंध की जाँच की।

     ऐसी दु:ख से खुद को मुक्त करने के लिए मैं जो कदम उठा सकता हूँ—यानी उस रास्ते पर चलना—वे भी दु:ख के कारण की तरह ही कई स्तरों वाले हैं। सबसे स्पष्ट बात जो मैं कर सकता हूँ, वह है दूसरों पर गुस्सा निकालना बंद करना। अनगिनत अर्थों वाला सूत्र एक महत्वपूर्ण सलाह देता है: मुझे ऐसे अभ्यास करने होंगे जो “गुस्से वाले इंसान [यानी मुझे!] में सब्र रखने की इच्छा जगाएँ” (सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र 23)। अगर मैं खुद को उस समय रोक सकूं जब मैं गुस्से में कुछ करने ही वाला होता हूँ, तो मैं इस तरह के गुस्से के विस्फोटों को रोक पाऊँगा । गुस्से और झुंझलाहट को प्रकट करने से खुद को रोककर मैं दूसरों के साथ झगड़ों से बच सकता हूँ और इस तरह खुद को और अपने आस-पास के लोगों को बहुत सारी परेशानियों से बचा सकता हूँ।

लेकिन लंबे समय में, अगर मैं उन भावनाओं का सामना न करूँ और उन्हें लगातार दबाता रहूँ, तो वे और मजबूत हो सकती हैं और आखिरकार कहीं ज्यादा जोरदार तरीके से फूट सकती हैं। दूसरे शब्दों में, इस तरह का आत्म-नियंत्रण, भले ही मददगार और कभी-कभी जरूरी हो, ज्यादा से ज्यादा सिर्फ प्राथमिक उपचार (first aid) जैसा है; यह असल मायनों में बोधिसत्व का धैर्य नहीं है। जैसा कि संस्थापक निवानो ने कहा है, जब हम खुद को मुश्किल हालात का सामना करने के लिए मजबूर करते हैं और गुस्से व नाराजगी को दबाते हैं, तो “हम अभी भी नौसिखिए ही होते हैं” (बौद्ध धर्म आज के लिए 220)।

पुण्डरीक सूत्र का 10वां अध्याय हमें बताता है कि सहनशीलता दो चीजों के साथ आती है: सभी के लिए करुणा और सभी चीजों को समान समझना। अगर मैं करुणा दिखाने की अपनी क्षमता को बढ़ा सकूँ और लोगों को समानता की नजर से देख सकूँ, तो ट्रैफिक जाम या ऐसी ही किसी मुश्किल स्थिति में फँसने पर, मैं अपने साथ फँसे लोगों को दुश्मन मानने के बजाय स्वाभाविक रूप से उनके प्रति सहानुभूति महसूस करूँगा।

करुणा और समभाव को बढ़ाने के लिए कुछ ठोस तरीके क्या हैं? मैं समापन सूत्र के इन निर्देशों का पालन करके दोनों को विकसित कर सकता हूँ: “सभी लोगों को बुद्ध के रूप में और सभी जीवों को अपने माता-पिता के रूप में देखना” (सद्धर्मपुण्डरीक सूत्र 390)। दैनिक सूत्र पाठ के अंत में अपनी पुण्य-अर्पण की प्रक्रिया में कई दुखी लोगों को शामिल करके उनके लिए प्रार्थना करना,यानी उनकी खुशी और उनके दुखों के अंत की कामना करना,करुणा विकसित करने का एक और तरीका है। दूसरों के भले के लिए काम करके इस भावना को ठोस कार्यों में बदलना,जिसे आमतौर पर उदारता का अभ्यास माना जाता है,दूसरों के साथ एकता की भावना पैदा करके करुणा और समभाव को बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।

ये अभ्यास बोधिसत्व के रास्ते का हिस्सा हैं और क्रोध को दूर करने के लिए जरूरी उपाय हैं, लेकिन मुझे इसे पूरी तरह खत्म करने पर ही बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि ऐसी सोच मुझे उस क्रोध के प्रति प्रतिक्रिया देने के चक्र में फँसाए रख सकती है। जैसा कि संस्थापक निवानो चेतावनी देते हैं, “जब तक हम अपनी गलतफहमियों पर ही अटके रहते हैं और सोचते रहते हैं कि ‘मैं अपनी गलतफहमियों/ भ्रम से मुक्त होना चाहता हूँ, मैं उनसे मुक्त होना चाहता हूँ,’ तब तक हमारा मन गलतफहमी/ भ्रम के विचार में ही उलझा रहता है, जिससे उनसे मुक्त होना नामुमकिन हो जाता है” (शिनशाकु होक्के सानबुक्यो 1:307)।

इसके अलावा, अगर मैं अपने क्रोध को एक दुश्मन की तरह देखूँ जिसे खत्म करना है, तो मैं उस क्रोध में छिपी करुणा को नहीं देख पाऊँगा—यानी नरक जैसी स्थिति में भी बोधिसत्वों की दुनिया को नहीं खोज पाऊँगा। मेरा क्रोध भले ही सही तरीका न हो, लेकिन साथ ही यह मेरे लिए करुणा का ही एक रूप है, क्योंकि यह उस तकलीफ से बचने की मेरी गहरी इच्छा से पैदा होता है जो मुझे बचपन में देर से काम करने की वजह से झेलनी पड़ी थी। इस गहरी इच्छा को पहचानना और स्वीकार करना मेरे क्रोध की जड़ में छिपे पुराने घाव को भरने में मदद कर सकता है। 

एक कदम और आगे बढ़कर, मैंने पाया कि जिन लोगों ने मेरे देर से आने समेत कई बातों के लिए मुझे कड़ी फटकार लगाई थी, उनके गुस्से (नरक का दायरा) के पीछे छिपी करुणा (बोधिसत्व का दायरा) को भी मुझे समझना था। दिल से, वे मेरी खुशी के बारे में चिंतित थे, भले ही अपनी पीड़ा के कारण, वे मुझे मार्गदर्शन देने की कोशिश में निश्चित रूप से अकुशल थे। बौद्ध दृष्टिकोण से यह क्षमा है।

‘मार्ग के सत्य’ का अभ्यास करने का मतलब है ऐसी कई तरह की अभ्यास को अपनाना जो दु:ख के कारणों को अलग-अलग तरीकों से दूर करती हैं। अगर मैं दैनिक जीवन में सचेत रहूँ, तो मैं गुस्से के अचानक भड़कने को रोक सकता हूँ। लेकिन इस तरह के तात्कालिक उपाय से आगे बढ़कर, मुझे ऐसा अभ्यास भी करना चाहिए जो गुस्से के इलाज का काम करें और करुणा व समभाव की अपनी क्षमता को बढ़ाकर धीरे-धीरे उस पर काबू पाने में मदद करें। आखिर में, मैं अपने गुस्से को गहराई से समझकर उसमें छिपी ‘बोधिसत्व की भावना’ को खोज सकता हूँ; यह गुस्से को अपने “अच्छे दोस्त” — यानी अपने निजी देवदत्त के रूप में अपनाने का एक तरीका है। गुस्से को दबाने या उसका विरोध करने के बजाय, यह दृष्टिकोण उसे बदल देता है और उस करुणा को सामने लाता है जो उसका मूल स्वभाव, यानी बुद्ध स्वभाव है। अगली बार, हम ‘निर्वाण’ के सत्य पर, यहीं और अभी धर्म का अभ्यास करने के दृष्टिकोण से विचार करते हुए अपनी चर्चा पूरी करेंगे।